Monday, September 5, 2016

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गणेश चतुर्थी है एक महान गणेश उत्सव जो विनायक चतुर्थी के रूप में भी जाना जाता है । इस दिन भगवान गणेश के जन्मदिन के रूप में दुनिया भर के हिंदुओं द्वारा मनाया जाता है। यह भद्रा (मध्य सितंबर से मध्य अगस्त) के हिंदू महीने के दौरान मनाया जाता है और और उनमें से सबसे विस्तृत, विशेष रूप में महाराष्ट्र में दस दिनों के लिए रहता है जो अनंत चतुर्दशी के दिन को समाप्त होता है ।


भगवान गणेश की एक मिट्टी की मूर्ति गणेश चतुर्थी के दो तीन महीने पहले से बनाया जाता है। इस मूर्ति का आकार एक इंच से पच्चीस फुट तक हो सकते हैं। त्योहार के दिन, यह घरों में सिंघासन पर रखा जाता है या फिर लोगों को देखने और उनकी श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए बाहर अलंकृत तम्बू में सजाया जाता है । आम तौर पर लाल रेशमी धोती और शॉल पहने हुए पुजारी मंत्रों के जप के बीच मूर्ति में जीवन दान करता है। इस अनुष्ठान को प्राण प्रतिष्ठा कहा जाता है। इस के बाद श्रद्धांजलि अर्पित की सोळा तरीके शुरू होता है।

नारियल, गुड़, इक्कीस मोदक, इक्कीस तिनका दुर्बा और लाल फूल पेशकश किया जाता है। मूर्ति को लाल मरहम या चंदन के साथ अभिषेक किया जाता है। समारोह के दौरान, ऋग्वेद से वैदिक भजन और गणपति अथर्ववेद शीर्ष उपनिषद, और गणेश स्तोत्र नारद पुराण से जप किया जाता हैं।

पूरे समुदाय गणेश के पूजा करने के लिए खूबसूरती से मंडप में आता है। त्योहार के दिनों के दौरान नि:शुल्क चिकित्सा जांच, रक्तदान शिविर, गरीब के लिए दान, नाटकीय प्रदर्शन, फिल्म, भक्ति गीत आदि आयोजन किया जाता हैं।

गणेश चतुर्थी के दिन, लोग सुबह ब्रह्ममुहूर्त के दौरान भगवान गणेश से जुड़े हुए कहानियों पर ध्यान करते हैं। फिर, स्नान के बाद, मंदिर में जाकर भगवान गणेश की प्रार्थना करते हैं। उसे कुछ नारियल और मीठा हलवा प्रस्तुत करते हैं । फिर भक्ति और आस्था के साथ प्रार्थना करते हैं ताकि गणेश सभी बाधाओं को दूर करे और बो आध्यात्मिक पथ पर निकाल सकते हैं । उसे घर पर भी पूजा करते हैं । पुराण के अनुसार उस दिन चंद्रमा को देखना नहीं चाहिए ।

दस दिनों के लिए, भाद्रपद शुद्ध चतुर्थी से अनंत चतुर्दशी तक, गणेश पूजा की जाती है। एगर वें दिन पर, मूर्ति को सड़कों के माध्यम से एक जुलूस के साथ नृत्य, गायन के बीच ले जाया जाता है, नदी या समुद्र में विसर्जन के लिए जो प्रतीक है प्रभु की अपनी निवास कैलाश यात्रा की, जबकि सभी आदमी का विषाद साथ ले जाता है । सभी इस अंतिम जुलूस मे पुकारते है गणपति बप्पा मोरया, पूरच्या वर्षी लौकरिया, जिसका मतलब है 'हे देव गणेश, फिर अगले साल जरूर आना । इसके बाद नारियल, फूल और कपूर की अंतिम भेंट देकर, लोग नदी में मूर्ति विसर्जन करते हैं।
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