आईपीएल का इतिहास

इंडियन प्रीमियर लीग जिसे संक्षिप्त में आईपीएल के नाम से भी जाना जाता है, बीसीसीआई द्वारा संचालित ट्वेंटी-20 क्रिकेट प्रतियोगिता है। क्रिकेट की दुनिया में आईपीएल की शुरुआत एक अहम मोड़ थी। भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ने धूम-धड़ाके से आईपीएल की 14 सितंबर 2007 को शुरुआत की। ट्वेन्टी-20 के प्रति भारतीय क्रिकेट बोर्ड का प्रेम उस समय जगा जब भारत ने 2007 में ट्वेन्टी-20 विश्व कप में ख़िताबी जीत हासिल की। डगर कठिन थी लेकिन कप्तान महेंद्र सिंह धोनी की सेना ने हार न मानी और टी-20 क्रिकेट वर्ल्ड कप के पहले संस्करण में टीम को जीत दिलाई।

हर जीत की तरह इस जीत के साथ एक नए अध्याय की शुरुआत हुई। भारत में वैसे भी क्रिकेट का एक अलग मुकाम है और इस जीत के बाद यहां भी टी-20 क्रिकेट की लोकप्रियता बढ़ने लगी। फिर तो क्रिकेट की आर्थिक महाशक्ति इसका अर्थशास्त्र भी समझने लगी। बीसीसीआई ने इस लोकप्रियता को व्यर्थ न जाने दिया और शुरुआत हुई आईपीएल की। जिसमें बीसीसीआई ने अन्य देशों की ट्वेन्टी-20 प्रतियोगिता की चैम्पियन टीमों को दावत दी।

आईपीएल समिति का अध्‍यक्ष ललित मोदी को बनाया गया जिन्‍होंने आईपीएल की सफलता को शिखर तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई। हालांकि उन्‍होंने 1996 में बीसीसीआई के सामने अपने इस विचार को रखा था लेकिन घरेलू क्रिकेट को देखते हुए बोर्ड ने इसे लागू करने से मना कर दिया। लेकिन 'ज़ी ग्रुप' द्वारा अप्रैल 2007 में आईसीएल के नाम से इसी तरह की एक लीग की शुरुआत करने के बाद आईपीएल लांच किया गया। आईपीएल ज़ी-समूह के इंडियन क्रिकेट लीग (आईसीएल), यूरोप में क्लब फ़ुटबॉल की प्रतियोगिता चैम्पियंस लीग और नेशनल बॉस्‍केटबॉल लीग को ध्‍यान में रखकर शुरू किया गया।

क्रिकेट के इस फ़ॉर्मेट में सबसे ज़्यादा आश्चर्यजनक टीमों की नीलामी के साथ खिलाडियों की बोली (नीलामी) लगना रहा। युद्धस्तर पर काम शुरू हुआ। टीमें बनीं, टीमों की बोली लगी और फिर खिलाड़ी भी नीलाम हुए। आईपीएल की शुरुआत में सबसे पहला क़दम टीम बनाने का था। इसके लिए आठ टीमों पर बोली लगाई गई जिसे आठ अलग-अलग फ्रेंचाइजी ने ख़रीदा।

इंडियन प्रीमियर लीग में टीमों का शुरुआत हुई चेन्नई सुपर किंग्स, डेक्कन चार्जेर्स, मुंबई इंडियंस, कोलकाता नाइटराइडर्स, किंग्स इलेवन पंजाब, दिल्ली डेयरडेविल्स, रॉयल चैलेंजर्स बंगलोर, राजस्थान रॉयल्स।

वर्ष 2011 से आईपीएल में दो नई टीमें कोच्चि टस्कर्स केरल और पुणे वॉरियर्स इंडिया जुड़ी, किंतु वर्तमान में दोनों टीम समाप्त हो गईं है। उनके जगह ली है गुजरात लायंस, राइजिंग पुणे सुपर्गीअंट और सनराइजर्स हैदराबाद।

जब आईपीएल शुरू हुआ था तब यह तय किया गया था कि तीन साल तक हर टीम में एक–एक आइकन खिलाड़ी होगा। इस आधार पर सचिन तेंदुलकर (मुंबई इंडियंस), सौरव गांगुली (कोलकाता नाइटराइडर्स), राहुल द्रविड़ (रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरू), वीरेंद्र सहवाग (दिल्ली डेयरडेविल्स), वी.वी.एस लक्ष्मण (डेक्कन चार्जर्स) और युवराज सिंह (किंग्स इलेवन पंजाब) को आइकन खिलाड़ी चुना गया।

सभी टीमों ने बहुत पैसा खर्च किया और अपनी टीम को मज़बूत बनाने के लिए एक से बढकर एक धुरंधरों की सेना खड़ी की। आईपीएल के नियम के अनुसार इन खिलाड़ियों को तीन सालों के लिए अनुबंधित किया गया। आईपीएल के बाज़ार में दुनिया के शीर्ष खिलाड़ी बिकने को तैयार थे। क्या रिकी पोंटिंग, क्या शोएब मलिक, क्या मैथ्यू हेडन और क्या एंड्रयू साइमंड्स। इन सब खिलाड़ियों की बोली लगी, लेकिन बाज़ी मारी महेंद्र सिंह धोनी ने।

चेन्नई सुपरकिंग्स ने धोनी को सबसे ज़्यादा छह करोड़ में ख़रीदा। दूसरे स्थान पर रहे एंड्रयू साइमंड्स। टीम ख़रीदने वालों में भी सितारों का ताँता लगा। शाहरुख ख़ान को कोलकाता की टीम मिली तो प्रीति ज़िंटा ने पंजाब की टीम को ख़रीदा। मुकेश अंबानी के हिस्से में मुंबई की टीम आई, तो विजय माल्या ने बेंगलुरू की टीम पर दाँव लगाया।



टीम और खिलाड़ियों की ख़रीदारी के बाद सारा ध्यान आयोजन पर टिका था। मीडिया, मार्केटिंग, टीवी राइट्स, प्रायोजक और विज्ञापन। लगा जैसे भारत में क्रिकेट की आँधी चलने लगी हो। आईपीएल शुरू हुआ। मैच हुए और खिलाड़ियों के विस्फोटक प्रदर्शन भी हुए। इंडियन प्रीमियम लीग, भारत और भारतीय क्रिकेट को नई पहचान देने के साथ साथ एक ऐसा काम भी कर रहा है, जो दुनिया के लिए एक मिसाल साबित होगा।

देशी-विदेशी खिलाड़ियों का एक टीम में एक साथ खेलना, एक साथ रहना, खाना-पीना, जीत के लिए मिलकर रणनीति बनाना और वो भी नस्लभेद, रंगभेद, उंच- नीच, जात-पात जैसी कुरीतियों से दूर। भले ही आईपीएल बाज़ार की पैदाईश हो, लेकिन इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि ये भारत को एक नया मुकाम दिला रहा है। ये आईपीएल ही है जिसे अमेरिका, ब्रिटेन जैसे विकसित देशों के सिनेमाघरों में दिखाया जा रहा है। ये दुनिया के सबसे महंगे खेल फुटबॉल को भी पीछे छोड़ने लगा है।

भारत के ही नहीं, विदेशी अख़बारों में भी आईपीएल बराबर जगह पा रहा है। बाहरी खिलाड़ी यहां के लोगों के क़रीब आ रहे हैं। कहीं ना कहीं आईपीएल वो काम भी कर रहा है जिसका तसव्‍बुर इसे शुरू करते वक़्त नहीं किया गया होगा। ये आईपीएल का ही कमाल है कि जो खिलाड़ी पहले मैदान पर प्रतिद्वंद्वी बन कर उतरते थे, वो आज एक साथ जीत के लिए खेल रहे हैं। क्या कभी किसी सोचा होगा कि धोनी छक्का लगाकर मैच जिताएंगे और पवेलियन से श्रीलंकाई फिरकी गेंदबाज़ मुरलीधरन उछलते कूदते धोनी को बधाई देने के लिए इस क़दर भागेंगे।

ऐसे उदाहरण तमाम हैं। इससे उम्मीद की जा सकती कि जब विदेशी खिलाड़ी स्वदेश लौटेंगे, तो अपने देश के लोगों से मुख़ातिब होते हुए ये बताएंगे कि हमें हिन्दुस्तानियों से काफ़ी प्यार मिला। वहाँ हमारे कई सारे फैन हैं और कई नए दोस्त भी बने हैं, तो क्या इससे कुछ हद तक ये नस्लवाद की समस्या दूर नहीं होगी। खेल तो शुरू से ही मेल करता आया है और कराता रहेगा, चाहे वो कितना ही बाज़ारवाद में डूब क्यों ना जाए।